चारबाग में कदम रखते ही होता तहजीब का अहसास,
हुज़ूर सवारी किधर तशरीफ ले जाएगी ?
ऐसा शालीन था तांगेवाले का मिज़ाज।
तंग गलियों में भी था खुली हवा का एहसास ,
तांगा रुकते ही मोहल्ला टोला पूछता खरीयत ,
अदब से दुआ सलाम भेजता हर शक्स।
सिर पर खोमचा रखे माखन मलाई वाला फेरी लगाता ,
शाही शौक का दोना सजाता ।
क्या कहना चौक की लस्सी और कचौरी की दुकान !,
नहारी,बिरयानी और गिला वट कावाब ।
याद है वह कैसरबाग की गिलोरी और पान ,
और उसपर गम गम मेहक्ता किमाम ।
कैसे भूलें राम आसरे के लड्डू ,
या चौधरी का मलाई पान ।
वह बिगड़े नवाबों की तीतरबाजी ,और लखनऊ के बांकों की पतंगबाजी ।
शतरंज की बिसात का क्या मिसाल ,
प्यादों की चाल से बादशाह की मात ।
वह बड़े मंगल की सजी धूमधाम,पूर्ण हो बजरंगबली से मांगे वरदान ।
गजब थी भूलभुल्लैया की आशिकी ,और रूमी दरवाज़े की कलात्मक सादगी !
चाहे हो छतर्मंजिल की भव्य इमारत ,या हजरतगंज की शामों की रौनक ,जहां रिक्शे पर बैठी मेमे इठलाती,और पीछे पीछे दीवानगी चैन लुटाती ।
हां नरही का काफी हाउस,जहां सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट नेता रखते अपने भाव ।
काफी के प्यालों पर बहस छिड़ती,
और देश की राजनीति निखरती ।
क्या कहना दारुलशफा का ,
जहां ठहरते नेता युवा।
गोमती किनारे का नारंगी आसमान ,
मंदिर की घंटी और मस्जिद की आजां ।
वो मेडिकल कालेज के भूतों के किस्से ,
बनते पड़ते विद्यार्थियों के यादों के किस्से ।
लखनऊ की हवा की अलग ताज़गी ,बाग बगीचों की शोख राजसी ।
यहां झगड़े आप से शुरू होकर आप पर ख़तम होते ।
हुज़ूर पहले आप,पहले आप ,की शराफत ,फिर चाहे गाड़ी छूट जाए प्लेटफॉर्म पर ।
तहजीब ,नज़ाकत , लहज़ा शराफत ,हैं जिसके आभूषाण!
कैसे भूल ऐसे लखनऊ को हम ।
नमिता राय
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